कैलाश मानसरोवर यात्रा – मेरी अभिव्यक्ति
हिन्दू, जैन, बुद्ध और बॉन धर्म में कैलाश-मानसरोवर अत्यंत पूजनीय हैं | तिब्बत में स्थित भगवान शिव-पार्वती के निवास स्थान कैलाश पर्वत एवं भगवान ब्रह्मा द्वारा निर्मित मानसरोवर ताल को युग-युगांतर से अपनी आध्यात्मिक महिमा द्वारा परम तीर्थ का गौरव प्राप्त है | इस विषय में जानकारी बटोरते हुए, मुझे कोलिन थुब्रों की किताब ‘To a Mountain in Tibet’ पढ़ने का अवसर मिला | उनके विवरण से मैं प्रेरित हुआ और इस अलौकिक शक्ति के प्रत्यक्ष दर्शन करने की तीव्र अभिलाषा ने जन्म लिया | फल स्वरूप मुझे और नीरजा को कैलाश-मानसरोवर यात्रा का शुभ अवसर जून 2026 में प्राप्त हुआ |
हम एक ट्रेवल-ग्रुप के 46 यात्री लखनऊ में एकत्रित हुए और वहाँ से नेपाल गंज पहुँचे | लखनऊ से नेपाल गंज 180km का सफ़र गाड़ी से 5hrs में पूरा हुआ | अगले दिन नेपाल गंज से सिमिकोट की 45 min की हवाई यात्रा दोपहर 2 बजे शुरू हुई | सिमिकोट नेपाल-चीन सीमा पर स्थित एक छोटा सा गाँव है | आर्थिक रूप से सिमिकोट पिछड़ा हुआ है पर मुझे उम्मीद है की नेपाल सरकार यहाँ सुधार करेगी | यहाँ से हेलीकाप्टर द्वारा 20min में हिलसा पहुँच गए | होटल पहुँचते ही ज्ञात हुआ कि अनेक ग्रुप के करीब 200 यात्री बॉर्डर पार कर यात्रा शुरू होने की प्रतीक्षा में हैं | यह संख्या हिलसा जैसे छोटे से गांव के लिए अत्याधिक थी | कई यात्री 2-3 दिन से हिलसा में ही रुके हुए थे क्यूँकि चीन के अधिकारी हर दिन अपनी सुविधानुसार संख्या में इमीग्रेशन की अनुमती देते हैं | अब तक हमारा ग्रुप एक सयुंक्त परिवार के सांचे में ढल गया था | इस बंधन की आवश्यकता हमें अगली सुबह होनी थी! हुआ यूँ कि कार्यक्रम अनुसार हम बॉर्डर पर पहुँच गए और करीब 1 घंटे बाद पता चला कि हमारा नंबर आज नहीं आएगा | ज़ाहिर बात है कि सब बहुत परेशान और मायूस हुए | एक दूसरे को हिम्मत देते हुए सब ने एक और रात हिलसा में गुज़ार ली | इस यात्रा में कुछ दिनों का विलंब होना आश्चर्य नहीं है |
यात्रा की छठी सुबह सुबह हर व्यक्ति की उम्मीद यही थी कि अब बॉर्डर पार कर पुरांग पहुँचें | एक बार फिर हम ‘हर हर महादेव’ की प्रार्थना करते इमीग्रेशन गेट पर थे | कुछ समय बीता और आखिरकार हमारी यात्रा आगे बढ़ी | चीन की इमीग्रेशन प्रक्रिया अत्यंत अनुशासित होती है | तक़रीबन हर एक यात्री का सामान, मोबाइल फोन, लैपटॉप इत्यादि बहुत ध्यान से देखा गया | कोई भी ऐसी वस्तु जो चीन के नियमों के विपरित मिलती है तो पूरे ग्रुप के लिए समस्या बन सकती है | नेपालगंज में मिले निर्देश अब वास्तविक रूप में कार्य सिद्ध हो रहे थे | पुरांग तक का सफ़र अत्यंत सुविधाजनक था | शहर समीप आते मुझे यह एहसास हुआ कि चीन ने इस क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर को बहुत मज़बूत किया है | पुरांग मिलिटरी क्षेत्र में है और यहाँ आधुनिक जीवन की सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं | यात्रा की हर आवश्यक वस्तु यहाँ से ख़रीदी जा सकती है | हमारे रहने की व्यवस्था भी बहुत बढ़िया होटल में हुई थी |
सातवें दिन का सूरज हमारी यात्रा को अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ देने के लिए उदय हुआ था | आज हम अपनी कल्पना, मनोकामना, भक्ति और एडवेंचर के हर रंग सहित पूजनीय मानसरोवर के समक्ष नतमस्तक होने जा रहे थे | मानसरोवर से पहले राक्षश ताल से गुज़रना हुआ | हिन्दू कथानुसार यह ताल अपवित्र है और यहाँ पूजा या स्नान वर्जित है | दरअसल इसका पानी खारा होने के कारण जीव जंतु के लिए हानिकारक है | यक़ीनन पौराणिक कथाओं का विज्ञान से अटूट सम्बन्ध है जिससे धार्मिक नियम द्वारा मनुष्य को सही-गलत समझाया जा सके | प्रकृति प्रेमी के दृष्टिकोण से रावण के अश्रु-जल से निर्मित राक्षस ताल भी अत्यंत मनोरम स्थल है | एक ऊँचे टीले से इसके एक छोर से दूसरे तक अद्भुत चित्रकला दिखाई दी| राक्षश ताल शायद कह रहा था कि “मेरा पानी तुम्हारे लायक नहीं पर आदिकाल से शिव-महिमा का साक्षी तो मैं भी हूँ” | इस ताल की उत्पत्ति भले ही महाबली रावण के अहंकार से हुई हो पर प्रकृति ने अपने सौन्दर्य साधन के रत्नों से इसको संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी |
पुरांग से 2 घंटे की बस यात्रा के दौरान मेरी कल्पना ने पवित्र मानसरोवर के कितने ही चित्रों का निर्माण कर लिया था | जिस वस्तु को हम अत्याधिक पाने की कोशिश में रहते हैं उसके निकट जाते हर पल व्याकुलता बढ़ती रहती है | अपने ख़्यालों से मुक्त हो यथार्थ में जब अचानक मानसरोवर की हल्की झलक मिली तो मन-मस्तिष्क में शून्यता थी | मुझे शरीर में एक कंपन का एहसास हुआ | आँखें मूंदे, सिर झुकाये, हाथ नमन मुद्रा करते मेरे रोम रोम से ‘हर हर महादेव’ का आह्वान था |
कुछ देर में गेस्ट हाउस आ गया जोकि मानसरोवर के समीप था | ठंडी हवा में दोपहर की सुहानी धूप, नील गगन में बादल अपनी मस्ती में व्यस्त और सूर्य किरणें इन्हें छेड़े कभी यहाँ तो कभी वहाँ से राह बनाती हुईं धरती से मिलन कर रही थीं | हमारी तरह शायद इन्हें भी एक लंबी यात्रा पश्चात् विश्राम की आवश्यकता थी पर मेरा मन मुझे सरोवर की ओर ले चला | हर कदम संग कई प्राचीन कथाएं, पवित्र स्थान की शुद्धता और इच्छापूर्ति की प्रसन्नता से असीम शांति का अनुभव हुआ | दूर हिमालय पर्वत-माला सरोवर को संजोए अपना प्राकृतिक धर्म निभा रही थीं | मौसम और सूर्य प्रकाश के कोण से पानी के रंग में अक्सर अद्भुत कलाकृति प्रदर्शित होती है | पारदर्शी जल आसमान का प्रतिबिंब प्रतीत हुआ और क्षितिज प्रकृति के माधुर्य का विस्तार | कुछ समय पश्चात् आसमान खुलने लगा और एकाएक पवित्र कैलाश पर्वत के प्रथम दर्शन ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया | लगा ईश्वर स्वयं उपस्थित होकर आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं और मेरी भक्ति-भावना ‘ॐ नमः शिवाय:’ के गुंजन से सिंचित अश्रुधारा द्वारा व्यक्त हो गई |
बेहतरीन सड़क मार्ग प्रभंध के कारण मानसरोवर की 90km की परिक्रमा बस यात्रा से 2 घंटे में पूरी हुई | मुझे इस बात की ख़ुशी है की पर्यावरण की शुद्धता को कायम रखने के लिए किसी यात्री का सरोवर में कदम रखना वर्जित है | मानसरोवर का पवित्र जल घर ले जाने हेतु शेरपा बंधू हमारी मदद करते हैं | ताल के सामने वाले छोर से कैलाश पर्वत के दर्शन हो रहे थे | हवा के झोंके जल की लहरों पर उनका ही आशीष हम तक पहुँचा रहे थे और हमने कायदे का पालन करते हुए सरोवर तट से जल को हथेली में लेकर अपने सर-माथे को इन स्नेह बूंदों का स्पर्श दिया | परिक्रमा के बाद हम कुछ यात्री दारचेन के लिए रवाना हो गए | 1 घण्टे में 50kms का सफ़र पूरा हुआ और हम होटल पहुँचे | दारचेन से कैलाश परिक्रमा आरम्भ होती है और कैलाश पर्वत इस शहर के हर छोर से दिखाई देता है |
आठवें दिन की दोपहर में हम दारचेन से आधे घंटे में कैलाश अष्टपद गए | हम वहाँ पहुँचे और बारिश होने के संकेत मिलने लगे | हर दिशा में काले बादल छाए थे परन्तु सौभाग्यवश कैलाश पर्वत और उनके सामने विराजमान नंदी जी हमें साफ़ नज़र आ रहे थे | कालिमा चाहती तो एक पल में यह दर्शन हमारी नज़रों से गायब कर सकती थी पर उसे सर्वव्यापी प्रभु की अनुमति नहीं मिली | अभिलाषाओं के मायाजाल में घिरा मेरा मन इस पल कुछ मांगने में विफल था | वह मुझसे यही कहता रहा, “जिसने बिना मांगे मेरे जीवन को अपनी अनुकम्पा से संवारा उससे और क्या मांगू ?” मैं आँखें मूंदे, हाथ जोड़े धन्यवाद् करता अपने समक्ष प्रस्तुत शक्ति को समझने का प्रयास करता रहा | मेरे लिए यही क्या कम था कि अनंत काल से जिस शिला पर ब्रह्माण्ड की धुरी आश्रित है, उससे आज मेरा साक्षात वार्तालाप हो रहा है |
नवें दिन प्रातः 8 बजे हम दारचेन से 25 kms दूर यमद्वार पहुँचे जहाँ से कैलाश परिक्रमा आरम्भ होती है | यमद्वार मंदिर में सफल यात्रा की प्रार्थना करने पश्चात् हम स्फूर्तीपूर्वक कदम से कदम मिलाते और भगवन शिव का ध्यान करते आगे बढ़े | यमद्वार से 14kms दूर डेरापुक परिक्रमा का प्रथम पड़ाव है | पहले दिन कि यात्रा सरल मानी जाती है क्यूँकि रास्ता ज़्यादातर समतल है | आज सुबह से ही मौसम साफ़ नहीं था पर आसमान में काले बादलों के बावज़ूद अभी तक कोई विशेष दुविधा का सामना नहीं हुआ | बीच रास्ते में कुछ दुकानें मिलती हैं जहाँ यात्री चाय-नाश्ते सहित विश्राम करते हैं | यदि यात्री अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखते हैं तो ऊंचाई पर ऑक्सीजन कि कमी होने से बहुत कठिनाई होती है इसलिए टूर गाइड्स के निर्देश का पालन आवश्यक है |
ज़्यादातर व्यक्ति पैदल या पोनी-सवारी द्वारा अपनी परिक्रमा करते हैं पर तिब्बतन समुदाय की श्रद्धाशक्ति अतुल्य है | तिब्बती धर्म अनुसार यह साल ‘Year of fire horse’ है और इसकी मान्यता हिन्दू धर्म के महाकुम्भ जैसी है | अनेक पुरुष और महिला तिब्बती यात्री दंडवत प्रणाम करते हुए 18 दिन में परिक्रमा पूरी करते हैं | मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि कुछ ऐसे भी भक्त हैं जो पूर्वी तिब्बत से कैलाश परिक्रमा की 2000kms की यात्रा दंडवत प्रणाम करते हुए करीब 40 दिन में पूरी करते हैं | मैंने कुछ से बातचीत करी और देखा कि शरीर की थकान को मुस्कान भलीभांति छिपा रही थी | दंडवत प्रणाम का सजीव दृश्य अत्यंत आश्चर्य जनक था और एक बार फिर यह एहसास हुआ कि मनुष्य कि इच्छाशक्ति, निष्ठा, साहस और धैर्य ही उसके सर्वोच्च गुण हैं जो उसकी क्षमता की सीमा रेखा को व्यापक कर देते हैं |
4 घंटे चलते हम यमद्वार से 7kms आगे आ चुके थे यानिकि डेरापुक तक का आधा रास्ता पूरा हो चूका था | पर मौसम अब बिगड़ने लगा | बारिश, ठण्ड और तेज़ हवा ने रास्ता कठिन बना दिया | कुछ देर हम इसी आशा में चलते रहे कि मौसम सुधरेगा और बाकी का रास्ता आसान हो जाएगा | करीब 1 घंटे की कोशिश के बाद मुझे यह यकीन हो गया कि हालत निरंतर गंभीर होती जा रही है | खबर मिली कि डेरापुक से आगे 19000ft पर स्थित डोलमा-ला पास के रास्ते में 2-3 फ़ीट बर्फ है और अधिकारी किसी भी यात्री को डेरापुक से आगे जाने की अनुमति नहीं दे रहे हैं | मैंने जोखिम लेना सही नहीं समझा और अपने गाइड से सलाह करी | वह भी मेरे विचार से सहमत थे और दारचेन लौटने की बात उठी तो कुछ अन्य यात्री भी राज़ी हो गए | ईश्वर से आज्ञा ली और हम करीब 20 यात्री गाड़ी द्वारा अपने होटल वापिस आ गए | परिक्रमा पूरी नहीं करने की निराशा स्वाभाविक थी पर मेरे विचार से श्रद्धा और सावधानी के बीच संतुलन भी ज़रूरी है वरना पहाड़ी इलाके में बहुत मुश्किल हो सकती है | अगले दिन बाकी यात्री जो डेरापुक पहुँच गए थे वह भी वापिस होटल आ गए | कभी-कभी जीवन में सतत प्रयास के बाद भी सफलता नहीं मिलती क्यूँकि परिस्थिति प्रतिकूल हो जाती है |
हमारी यात्रा के दसवें और अंतिम दिन सामान बाँधा गया और बस पुरांग के लिए रवाना हुई | कैलाश पर्वत को प्रणाम किया पर वह तो अब लगातार हमारे साथ-साथ ही चल रहे थे | जिस के दर्शन हेतु हम तत्पर रहे वही इस समय हमें अपनी आँखों से दूर नहीं जाने देना चाहते थे जैसे पिता हृदय-रुदन और व्याकुलता को सम्भाले हुए अपनी संतान को जीवन राह में अग्रसर करता है | आदिकाल की महाशक्ति ईश्वर रूप त्याग अब एक सामान्य मनुष्य भांति भावुक थी | यह अनमोल पल मेरे जीवन में अविस्मरणीय हो गया…