पाटनकोडोली उत्सव
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के उत्सव प्रसिद्ध हैं | उदाहरणार्थ मुंबई से गणेश चतुर्थी, पुष्कर का ऊँट मेला, वृंदावन की होली, बंगाल की दुर्गा पूजा या केरल का थ्रिस्सूर पूरम | कुछ ऐसे उत्सव भी हैं जिनकी लोकप्रियता अपने क्षेत्र में सिमट कर रह गई | यह पर्याप्त मार्केटिंग के अभाव कारण सम्पूर्ण देश की आम जनता तक अपनी पहचान बनाने में असफल रहे | ऐसा ही एक अनजान उत्सव है महाराष्ट्र के पाटनकोडोली गाँव से ‘श्री विठ्ठल बीरदेव यात्रा’ |
‘My India Adventures’ के विज्ञापन द्वारा इस उत्सव का परिचय हुआ और मेरा कार्यक्रम Oct 11-12 का निश्चित हुआ | पाटनकोडोली गाँव महाराष्ट्र के मशहूर शहर कोल्हापुर से करीब 16 Kms दूर है | पाटनकोडोली में सदियों से लोकप्रिय श्री विठ्ठल बीरदेव भगवान का मंदिर है| इसलिए इस उत्सव को श्री विठ्ठल बीरदेव यात्रा नाम से जाना जाता है | हर साल दशहरा और दिवाली के अंतराल में इस यात्रा का आयोजन किया जाता है | महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के गाँव से किसान और चरवाहा समुदाय के बंधु लाखों की संख्या में यहाँ भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पण करने एकत्रित होते हैं |
अक्सर किसी नई जगह जाने से पहले मैं उसकी कुछ जानकारी हासिल कर लेता हूँ | परन्तु इस बार मैने कोई विशेष पूर्व ज्ञान नहीं बटोरा…कभी-कभी स्वयं को आश्चर्यचकित करने में भी आनंद आता है | इसी आशा सहित Oct 12 की सुबह गरम गरम नाश्ता करने पश्चात (क्यूँकि खाली पेट ना भजन होता है ना फोटोग्राफी 😉) हम पाटनकोडोली रवाना हुए | करीब 8:30am बजे,1 घंटे की यात्रा पश्चात गाँव नजर आने लगा | हर्ष उल्लास का अनुमान अक्सर हवा के ख़ुशनुमा झोंके पहले ही दे जाते हैं! उत्सव की चहल-पहल, दुकानों में विभिन्न प्रकार की सामग्री, ग्राहकों का मोल भाव हर मेले की जान होते हैं | ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यकायक मैं अपने बचपन से रूबरू हो गया | समय के बढ़ते कदमों ने यहाँ प्राचीन काल की परंपरा में कोई विघ्न नहीं डाला था|
यह उत्सव भक्ति भाव सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आनंददायक साधन है | हर गाँव से भक्ति गीत एवं नृत्य की टोलियाँ अपनी कला प्रदर्शन भरपूर जोश के साथ करती हैं | रंगारंग कपड़े, फूल-मालाओं से सुसज्जित, ढोल-मंजीरा-चिमटा लिए कलाकारों का उत्साह वातावरण की रौनक में चार चाँद लगा रहा था | हर कलाकार को दर्शक का प्यार और सम्मान सर्वप्रिय होता है और इसमें दर्शकों ने कोई कमी नहीं रखी | हर व्यक्ति का स्वभाव मिलनसार और स्नेहपूर्ण था | जहाँ आपसी समझ, विश्वास और आदर स्थापित हो वहाँ जीवन खुशहाल रहता है!
इस उत्सव में तमाम रंगो में हल्दी का पीला रंग सर्वाधिक महत्वपूर्ण है | हर व्यक्ति के माथे पर हल्दी-तिलक सुशोभित था | ग्रामीण बंधु अपनी गठरी सम्भाले हल्दी लहराते हुए उत्सव क्षेत्र की तरफ़ जाते दिखाई दिए | खेत की मेहनत को आज विश्राम की आज्ञा थी ! हर दिशा, हर व्यक्ति, धरती का हर कण पीले रंग से सराबोर था | मानो हल्दी अपना अस्तित्व पंचतत्व को सादर समर्पित कर रही थी | पूरा माहौल हल्दी के पीले रंग की आड़ में आ चुका था | कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जो सिर से पाँव तक हल्दी में नहीं लिपटा हो | हल्दी के इस तरह हवा में लहराने का भी एक कारण है | हल्दी रंग सूर्य का प्रतीक है और इसका उपयोग धार्मिक कार्य में शुभ माना जाता है | हल्दी स्वास्थ्य के लिये भी लाभदायक है और इस का उपयोग शरीर को बीमारियों से सुरक्षित रखता है |
इस अद्भुत उत्सव का मुख्य आकर्षण ग्रामीण समुदाय के आध्यात्मिक गुरु फरांदे बाबा की सोलापुर जिले के अंजनगांव से पाटनकोडोली की करीब 240 km पदयात्रा है | 21 दिन की पदयात्रा पश्चात बाबा का पाटनकोडोली में आगमन होता है | मार्ग पर उपस्थित श्रद्धालुओं को आशिर्वाद प्रदान करते हुए बाबा मुख्य मंदिर के आँगन में विराजमान होते हैं | प्रातःकाल से ही श्रद्धालु उनके दर्शन हेतु आँगन में उमड़ पड़ते हैं | 3-4 घंटे के अन्तराल में सभी उपस्थित जान मानस ने मंडप को ऐसे घेर लिया कि धरती का कोई कोना नज़र नहीं आ रहा था | सभी लोग बाबा का अत्यंत महत्वपुर्ण हेडम नृत्य देखने को उत्सुक थे और उसका समय अब नज़दीक आ रहा था | शनैः-शनैः मानव जाति का उभरता ऐसा सैलाब मैंने पहले कभी नहीं देखा था! उत्सव में लाखों लोगों की भीड़ को नियंत्रित रखना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है और इसे कोल्हापुर पुलिस ने बखूभी निभाया |
दोपहर करीब 1:15pm पर बाबा का पारम्परिक हेडम नृत्य शुरू हुआ | इस में फरांदे बाबा चरवाहा समुदाय की पवित्र तलवार को हाथ में लिए अनेक मुद्राओं में नृत्य करते हुए ईश्वर से भक्तजनों के लिए आशिर्वाद की कामना करते हैं | ईश्वर से संपर्क स्थापित करने वास्ते दुनिया भर में जो अनेक प्रकार के पारम्परिक लोक नृत्य, धार्मिक अनुष्ठान प्रचलित हैं उनमे से एक हेडम नृत्य भी है | 15 min के फुर्तीले नृत्य के बाद बाबा मंडप से प्रस्थान कर गए और भीड़ भी धीरे-धीरे कम होने लगी |
हेडम नृत्य समाप्त होते ही कई श्रद्धालु ज़मीन पर फैली हुई हल्दी बटोरते दिखाई दिए | ज्ञात हुआ कि इस हल्दी को वह प्रसाद का सम्मान देते हुए अपने घरों में धार्मिक कार्यों और औषद्यि के लिए उपयोग करते हैं | कलाकारों का संगीत कार्यक्रम फिर अपना रंग दिखाने लगा | दुकानों में फिर चहल-पहल शुरू हो गई | व्यापार में पारम्परिक अनुष्ठान और लाभ का संतुलन बहुत विशेष होता है | किसी धार्मिक कार्य हेतु कुछ देर के लिए विराम आ सकता है पर तत्पश्चात लेन-देन पुनः आरम्भ होना भी आवश्यक है |
मैंनें विचार किया कि यह ग्रामीण क्षेत्र अपने जीवन से बहुत ज़्यादा नहीं मांगते | अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ समय निकालकर सामुहिक रूप से कला, संस्कृति, श्रद्धा भाव में मग्न इस वार्षिक उत्सव की पारम्परिक ज्योति को प्रज्वलित रखते हैं | ऐसा क्या मंत्र है जो इन सब को एक सूत्र में बांधे रखता है | उत्सव के सभी कार्यक्रम उस एक सूत्र की मज़बूती कायम रखने के माध्यम हैं| यह सूत्र मनुष्य की सर्वोपरी अभिलाषा में निहित है | हर इंसान यह चाहता है कि अपनी खुशी को दूसरों के साथ बांट सके, अपनी हल्की सी मुस्कान के बदले किसी परिचित या अपरिचित चेहरे की मुस्कान द्वारा आपसी मित्रता का संबंध स्थापित कर सके | सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और मानसिक विकास हेतु मानव जाती में परस्पर सहयोग और विचार विमर्श की भावना अति आवश्यक है | हमारे पूर्वजों ने इस सूत्र को भली भांति पहचाना था | उन्होंने इस प्रवृति को प्रचलित करने हेतु मनोरंजन और संस्कृति का संतुलित मिश्रण अपनाया होगा | वस्तुतः यही भावना भारत के कई उत्सवों का स्रोत है | दुनिया अब विकास की नई विचारधारा पर अग्रसर हो रही है जहाँ मानव संपर्क पत्र व्यव्हार, बैठक, सम्मलेन, चौपाल इत्यादि से विरक्त हो एल्क्ट्रॉनिक्स में सिमट रहा है | समय के साथ चलना सही और आवश्यक है पर अतीत के कुछ पन्नों को साथ रखे हमें जीवन की मूल जड़ों से संबंध बनाए रखना चाहिए | पाटनकोडोली उत्सव इस दायित्व की पुष्टि का सजीव प्रमाण है…